अपने गढ़ में भाजपा चारों खाने चित, कानोड़ में कांग्रेस का दबदबा
सांसद-विधायक से लेकर 20 प्रभारी और 20 संयोजक तक मैदान में उतारे, फिर भी नहीं बचा सके भाजपा का गढ़, बड़े नेताओं की फौज भी नहीं दिला सकी जीत
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Yuvraj Pachori
Journalist
September 15, 2026
7 min read
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20 में से 14 वार्ड कांग्रेस के कब्जे में, भाजपा महज 6 सीटों पर सिमटी
कानोड़। कानोड़ नगरपालिका चुनाव के परिणामों ने भाजपा के मजबूत संगठनात्मक दावों और चुनावी रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोमवार को पण्डित उदय जैन महाविद्यालय में हुई मतगणना में कांग्रेस ने भाजपा को करारी शिकस्त देते हुए 20 में से 14 वार्डों में जीत दर्ज की, जबकि भाजपा 6 वार्डों तक सिमट गई। निर्दलीय प्रत्याशी इस बार खाता भी नहीं खोल सके। चुनाव परिणाम सामने आते ही कानोड़ की स्थानीय राजनीति में कांग्रेस का पलड़ा भारी हो गया है और नगरपालिका में कांग्रेस का बोर्ड बनना लगभग तय माना जा रहा है। मतगणना सुबह 8 बजे शुरू हुई और दो-दो राउंड में परिणाम सामने आते गए। दोपहर तक सभी 20 वार्डों की तस्वीर साफ हो गई। परिणामों के साथ ही कांग्रेस खेमे में जश्न का माहौल रहा, जबकि भाजपा खेमे में हार के कारणों को लेकर मंथन शुरू हो गया।
बड़े नेताओं की फौज भी नहीं दिला सकी जीत-
इस चुनाव में भाजपा ने जीत के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी। सांसद, विधायक, पूर्व विधायक, पूर्व प्रदेश मंत्री, भाजपा देहात जिलाध्यक्ष सहित पार्टी के कई बड़े नेता चुनावी रणनीति में जुटे थे। इतना ही नहीं, 20 वार्डों के लिए 20 प्रभारी और 20 संयोजक नियुक्त किए गए थे। इसके बावजूद परिणाम भाजपा के पक्ष में नहीं आए। जिन वार्डों में संगठन के बड़े पदाधिकारी और पूर्व पार्षद सक्रिय थे, वहां भी भाजपा को कई जगह हार का सामना करना पड़ा। इससे साफ है कि इस बार चुनाव में संगठन की ताकत से ज्यादा स्थानीय समीकरण, प्रत्याशी की स्वीकार्यता और वार्ड स्तर की नाराजगी प्रभावी रही।
कांग्रेस को 842 वोट की बढ़त-
20 वार्डों में पड़े मतों की तस्वीर भी कांग्रेस के पक्ष में रही। कांग्रेस को कुल 3791 वोट, भाजपा को 2949 वोट, निर्दलीय प्रत्याशियों को 899 वोट और नोटा को 117 वोट मिले।इस तरह कांग्रेस ने भाजपा से 842 वोट अधिक हासिल किए। सीटों के साथ-साथ कुल मतों में भी कांग्रेस की बढ़त ने भाजपा की हार को और बड़ा बना दिया।
अपने ही वार्डों में नहीं बचा सके भाजपा नेता-
चुनाव परिणामों में भाजपा के लिए सबसे चिंताजनक पहलू यह रहा कि पार्टी से जुड़े कई प्रमुख चेहरे अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में भी प्रत्याशियों को जीत नहीं दिला सके।पूर्व पार्षद लक्ष्मी लाल ओड़ की पत्नी सुमित्रा ओड़ वार्ड 9 से चुनाव हार गईं। वहीं पिछली बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़कर हार चुके बृजेश कुमार रेगर इस बार भाजपा के टिकट पर वार्ड 11 से मैदान में उतरे, लेकिन उन्हें भी सफलता नहीं मिली। भाजपा के पूर्व पार्षद एवं प्रत्याशी दौलतराम भोई को वार्ड 19 में हार का सामना करना पड़ा। इसी वार्ड में निर्दलीय प्रत्याशी प्रकाशचंद प्रजापत को एक भी वोट नहीं मिला और उनके खाते में शून्य मत दर्ज हुए।
पूर्व मंडल अध्यक्ष भी नहीं बचा सके सीट-
भाजपा के पूर्व मंडल अध्यक्ष अनुप कुमार श्रीमाली भी वार्ड 18 से चुनाव हार गए। वहीं नगरपालिका चुनाव के भाजपा संयोजक एवं पूर्व मंडल अध्यक्ष भगवती लाल शर्मा के निवास वाले वार्ड 10 में भी भाजपा प्रत्याशी को हार मिली।इन परिणामों ने भाजपा के स्थानीय संगठन के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं कि आखिर मजबूत संगठन और बड़े नेताओं की सक्रियता के बावजूद मतदाताओं का रुझान पार्टी के पक्ष में क्यों नहीं बन पाया।
कांग्रेस के गढ़ में भी लगा झटका-
हालांकि कांग्रेस के लिए भी चुनाव पूरी तरह एकतरफा नहीं रहा। नगर कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष रांका के निवास वाले वार्ड 8 में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। इससे यह संकेत भी मिला कि चुनाव में नेताओं का व्यक्तिगत प्रभाव निर्णायक नहीं रहा। मतदाताओं ने वार्ड स्तर पर प्रत्याशी की पकड़, स्थानीय मुद्दों और व्यक्तिगत समीकरणों को ज्यादा तवज्जो दी।
ब्रह्मपुरी में भाजपा को सबसे बड़ा झटका-
जिस गढ़ में कांग्रेस की जमानत जब्त हुई थी, वहीं भाजपा तीसरे नंबर पर : कानोड़ नगरपालिका चुनाव का सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाला परिणाम ब्रह्मपुरी क्षेत्र का रहा। यह क्षेत्र लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। पिछले चुनाव में जहां कांग्रेस की जमानत तक जब्त हो गई थी, इस बार उसी क्षेत्र में भाजपा को करारा झटका लगा और पार्टी प्रत्याशी तीसरे स्थान तक पहुंच गया। वार्ड 4 से भाजपा ने पिछले चुनाव में हार चुके हितेंद्र सुथार को दोबारा मैदान में उतारा। स्थानीय स्तर पर प्रत्याशी चयन को लेकर नाराजगी की चर्चा चुनाव से पहले ही सामने आने लगी थी। पार्टी के बड़े पदाधिकारियों ने नाराजगी दूर करने और कार्यकर्ताओं को साधने के प्रयास किए, लेकिन इसका असर चुनाव परिणामों में दिखाई नहीं दिया। क्षेत्र में प्रत्याशी चयन को लेकर उपजी नाराजगी अंततः भाजपा के लिए भारी पड़ती नजर आई। परिणाम ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या पार्टी ने स्थानीय कार्यकर्ताओं और मतदाताओं की भावना को नजरअंदाज किया
158 मतों से जीतने वाले नेता के वार्ड में भाजपा प्रत्याशी 122 वोट पर-
पिछले चुनाव में पूर्व नेता प्रतिपक्ष दीपक शर्मा 158 मतों के अंतर से विजयी हुए थे। वहीं इस बार भाजपा प्रत्याशी हितेंद्र सुथार को वार्ड 4 में महज 122 वोट मिले और वे तीसरे स्थान पर रहे। इतना ही नहीं, ब्रह्मपुरी क्षेत्र में वार्ड 5 को छोड़कर भाजपा को अधिकांश स्थानों पर हार का सामना करना पड़ा। भाजपा के लिए यह महज चुनावी हार नहीं, बल्कि उसके परंपरागत मजबूत क्षेत्र में जनाधार के कमजोर होने का संकेत माना जा रहा है।
परंपरागत वोट बैंक में सेंध, संगठन के लिए खतरे की घंटी-
ब्रह्मपुरी क्षेत्र को भाजपा का परंपरागत वोट बैंक माना जाता रहा है। इसी क्षेत्र से पूर्व पालिकाध्यक्ष स्वर्गीय कुसुमलता, पूर्व उपाध्यक्ष दर्शन शर्मा, पूर्व नेता प्रतिपक्ष मनोज व्यास और पूर्व नेता प्रतिपक्ष दीपक शर्मा जैसे भाजपा के प्रमुख चेहरे भारी मतों से जीत दर्ज करते रहे हैं। ऐसे में इस चुनाव में भाजपा का इसी क्षेत्र में पिछड़ना पार्टी के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी तेज हो गई है कि यदि पार्टी अपने परंपरागत समर्थक क्षेत्र में ही मतदाताओं और कार्यकर्ताओं का भरोसा कायम नहीं रख पा रही है तो आने वाले चुनावों के लिए संगठन को रणनीति में बदलाव करना होगा।
प्रत्याशी चयन बना सबसे बड़ा सवाल
कानोड़ चुनाव परिणामों के बाद भाजपा में सबसे बड़ा सवाल प्रत्याशी चयन और स्थानीय संगठन के बीच तालमेल को लेकर उठ रहा है। चुनाव में बड़े नेताओं की मौजूदगी के बावजूद कई वार्डों में पार्टी प्रत्याशी अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सके। खास तौर पर ब्रह्मपुरी क्षेत्र के परिणामों ने इस बहस को और हवा दे दी है कि स्थानीय कार्यकर्ताओं की राय और जमीनी समीकरणों को नजरअंदाज कर चुनावी फैसले लेने का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा।
कांग्रेस के लिए सत्ता की राह साफ
14 वार्डों में जीत के साथ कांग्रेस ने नगरपालिका बोर्ड बनाने के लिए जरूरी बहुमत हासिल कर लिया है। चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस खेमे में उत्साह है। विजयी पार्षदों को बाड़ाबंदी स्थल से कारों के काफिले के साथ पूर्व विधायक प्रीति गजेन्द्र सिंह शक्तावत के नेतृत्व में कानोड़ तहसील कार्यालय पहुंचाया गया, जहां रिटर्निंग अधिकारी ने नवनिर्वाचित पार्षदों को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई।वहीं भाजपा के सामने अब हार के कारणों की समीक्षा और संगठन को फिर से मजबूत करने की चुनौती है।
परिणाम ने दिया साफ संदेश
कानोड़ नगरपालिका चुनाव का परिणाम केवल 14 बनाम 6 सीटों का आंकड़ा नहीं है। यह परिणाम स्थानीय राजनीति में बदलते समीकरणों का संकेत भी दे रहा है। बड़े नेताओं की मौजूदगी, संगठन की व्यापक तैयारी और वार्ड स्तर पर प्रभारी-संयोजक की तैनाती के बावजूद भाजपा मतदाताओं का अपेक्षित समर्थन हासिल नहीं कर सकी। दूसरी ओर कांग्रेस ने स्थानीय स्तर पर मजबूत प्रदर्शन करते हुए न केवल सीटों पर बढ़त बनाई, बल्कि कुल मतों में भी भाजपा से 842 वोट की बढ़त हासिल की। अब देखने वाली बात यह होगी कि भाजपा इस हार को महज चुनावी झटका मानकर आगे बढ़ती है या प्रत्याशी चयन, कार्यकर्ताओं की नाराजगी और स्थानीय संगठन के स्तर पर उठे सवालों पर गंभीर आत्ममंथन करती है। कानोड़ का यह परिणाम निश्चित रूप से आने वाले समय में स्थानीय राजनीति की दिशा तय करने वाला साबित हो सकता है।