लूणदा। ग्रामीण क्षेत्रों में आमजन को सुरक्षित
और सुगम आवागमन उपलब्ध कराने के लिए सरकार की ओर से सड़क निर्माण एवं डामरीकरण
कार्यों पर लाखों-करोड़ों रुपये की राशि स्वीकृत की जाती है। लेकिन यदि स्वीकृत
कार्य धरातल पर दिखाई ही नहीं दें और कागजों में उन्हें पूरा दर्शा दिया जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। लूणदा
क्षेत्र में सामने आए सड़क निर्माण से जुड़े दो मामलों को लेकर अब ग्रामीणों में
भी सवाल उठने लगे हैं। डीएमएफटी योजना के
तहत बस स्टैंड रोड से केरेश्वर महादेव तक करीब दो किलोमीटर सड़क के डामरीकरण के
लिए करीब 1 करोड़ 80 लाख रुपये की राशि स्वीकृत बताई जा रही
है। इस कार्य के लिए लगाए गए सूचना बोर्ड पर
कार्य प्रारंभ होने की तारीख 19 मार्च 2026 तथा कार्य पूर्ण होने की तिथि 16 अगस्त 2026 अंकित है। निर्धारित अवधि बीत जाने के बावजूद सड़क पर धरातल पर किसी प्रकार का
डामरीकरण कार्य शुरू नहीं हुआ है।
ऐसे में सबसे बड़ा
सवाल यह है कि जब सड़क का कार्य मौके पर शुरू तक नहीं
हुआ, तो कार्य प्रारंभ और पूर्ण होने की
तिथियां बोर्ड पर किस आधार पर अंकित की गईं? यदि कार्य अभी तक
शुरू नहीं हुआ है तो निर्माण कार्य से संबंधित सूचना बोर्ड लगाए जाने का औचित्य
क्या है? संबंधित विभाग को मौके पर वास्तविक
स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और यह बताना चाहिए कि स्वीकृत राशि, कार्य की प्रगति और बोर्ड पर अंकित
तिथियों के बीच इतना अंतर क्यों है।
आम्बा का कुआं से मगरीफला सड़क भी अधूरी
इसी तरह आम्बा का कुआं से मगरीफला तक करीब तीन
किलोमीटर सड़क के डामरीकरण का मामला भी सामने आया है। बताया जा रहा है कि संबंधित ठेकेदार की ओर से सड़क
पर गिट्टी डालने का कार्य तो कर दिया गया, लेकिन करीब 7-8 माह बीत जाने के
बाद भी डामरीकरण का कार्य पूरा नहीं किया गया है। इस सड़क के लिए
करीब 54 लाख रुपये की राशि स्वीकृत हुई थी और कार्य को दिसंबर 2025 तक पूर्ण किया जाना था। लेकिन निर्धारित समय सीमा निकलने के कई
माह बाद भी सड़क का डामरीकरण नहीं होने से ग्रामीणों को परेशानी का सामना करना पड़
रहा है। गिट्टी पड़ी होने के कारण आवागमन में दिक्कत के साथ धूल-मिट्टी की समस्या
भी बनी हुई है।
डामर महंगा होने से काम रुकने का तर्क
प्राप्त जानकारी के अनुसार सड़क के डामरीकरण में उपयोग होने वाला डामर महंगा होने के कारण ठेकेदारों द्वारा काम रोकने की बात सामने आ रही है। यदि डामर की कीमत बढ़ने के कारण निर्माण कार्य प्रभावित हुआ है तो संबंधित विभाग और ठेकेदार के बीच इसके समाधान की प्रक्रिया होनी चाहिए, ताकि आमजन को लंबे समय तक परेशानी न उठानी पड़े। लेकिन सवाल यह भी है कि यदि कार्य अधूरा है या धरातल पर शुरू ही नहीं हुआ है, तो कार्य की स्थिति को स्पष्ट रूप से सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? सूचना बोर्ड पर कार्य प्रारंभ और पूर्ण होने की तिथियां अंकित होने के बावजूद मौके पर काम नहीं होना कई सवाल खड़े करता है।
मौके पर हो जांच
सड़क निर्माण
कार्यों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए संबंधित विभाग के अधिकारियों को
दोनों स्थानों का मौका निरीक्षण करना चाहिए। साथ ही स्वीकृत राशि, कार्यादेश, कार्य प्रारंभ एवं पूर्ण होने की तिथि और अब तक हुए कार्य
की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए। सड़क निर्माण के लिए सरकारी राशि जनता की सुविधा के लिए
स्वीकृत होती है। ऐसे में यदि राशि स्वीकृत होने के बावजूद सड़कें समय पर नहीं
बनती हैं या कार्य अधूरा छोड़ दिया जाता है, तो इसका सीधा असर आमजन पर पड़ता है। जरूरत इस बात की है कि कागजों में दर्ज
प्रगति और धरातल पर वास्तविक स्थिति के बीच की सच्चाई सामने आए।
बड़ा सवाल
क्या सड़क निर्माण कार्य वास्तव में पूरा हुआ है? यदि नहीं, तो सूचना बोर्ड पर कार्य पूर्ण होने की तिथि क्यों दर्शाई गई? स्वीकृत राशि की अब तक क्या स्थिति है और दोनों सड़कों के निर्माण में देरी के लिए जिम्मेदार कौन है? इन सवालों का जवाब संबंधित विभाग एवं जिम्मेदार अधिकारियों से अपेक्षित है।




